ऐसा नहीं कि कोविड की विभीषिका से एनटीए, जो जेईई मेन और नीट परीक्षा कराने जा रही है वह अनभिज्ञ है. राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने सितंबर की परीक्षा के लिए खास तैयारी की है

जेईई और नीट परीक्षाओं के कराए न कराए जाने के सवाल ने पूरे देश को मथ डाला है. कोविड महामारी से जूझती केंद्र सरकार के सामने भी बेशक यह धर्मसंकट रहा ही होगा कि भारत के भविष्य निर्माण के कदमों को थाम दिया जाए कि सावधानी के साथ आगे की तरफ बढ़ा जाए. अब जब पूरी दुनिया यह मान चुकी है कि कोविड से लड़ने का एकमात्र रास्ता ‘सावधानी की जिन्दगी’ है तो यह अहम जवाब मिल रहा है कि क्यों न मॉस्क, सोशल दूरी सरीखे ‘न्यू-नार्मल’ के साथ आगे बढ़ा जाए? नरेन्द्र भाई की सरकार का परीक्षा कराए जाने का निर्णय दरअसल इसी सोच का प्रतिफल है.

मध्यवर्गीय परिवारों के सपनों को बढ़ाना होगा

भारतीय सपनों से जो भली तरह वाकिफ हैं वो जानते हैं कि बच्चों के जन्म के साथ, कई बार तो जन्म के पहले से ही, तय हो जाता है कि बच्चा डॉक्टर बनेगा या इंजीनियर ? आगे के पन्द्रह-सोलह साल सभी इसी ख्वाब को पोसने में लगे रहते हैं. कोचिंग सेंटर, स्कूल चयन, शिक्षक, शिक्षा का शहर, आस-पास की कम्युनिटी और मिलना-मिलाना, समारोहों में जाना या न जाना, मनोरंजन आदि-आदि पूरा परिवार मिलकर तय करता है और निर्णय की धुरी यही परीक्षा ही होती है.
बेशक, इस साल भी देश के लाखों परिवारों में सालों से ऐसे ही सपनों को जिया जा रहा था. मगर अचानक कोविड सरीखी महामारी ने सब कुछ उलझा दिया. पूरी दुनिया लॉकडाउन और अनलॉक में उलझी तो लाखों सपने भी इसी भंवर में फंस गए. लेकिन केंद्र सरकार के कड़े, कुछ अप्रिय, दूर भविष्य के लिए हुए फैसले ने देश को आगे की राह दिखाई है.

ठहर जाना तो हिन्दुस्तान का विकल्प नहीं

दरअसल, किसी भी देश के लिए यह विकल्प नहीं है कि उसे लम्बे अर्से तक तालों में जकड़ दिया जाये. जंजीरों की जकड़ धीरे-धीरे हल्की करनी होगी, सावधानी के साथ हालात से जूझना होगा. कोविड से लड़ाई का भी फिलहाल यही एक मात्र रास्ता है. बीते महीनों में क्रमश: ढ़ील भी दरअसल इसी रणनीति का ही हिस्सा थी. अब जब कोरोना का रिकवरी रेट 75 फीसदी तक जा पहुंचा है तो धीरे-धीरे हमें भविष्य तैयार करने की राह पर भी बढ़ना ही होगा.
 
सरकार की बेहतर जागरूकता पॉलिसी का ही नतीजा है कि आज हर शहरी-गंवई शख्स यह भली भांति जानता है कि इस कोविड काल में उसका बर्ताव कैसा होना चाहिए? तकरीबन हर चेहरे पर मॉस्क और ठेलने-धकेलने की हड़बड़ी से सार्वजनिक जीवन में परहेज इसी जागरूकता का ही तो नतीजा है.

‘विरोध’ के लिए विरोध ठीक नहीं

इस कोविड काल में जब विरोधी दलों को सरकार के साथ जिन्दगी को आगे बढ़ाने की कवायद में तन-मन-धन से जुटना चाहिए था, वो विरोध की सियासत में अपनी ताकत खपा रही हैं. यह यही बताता है कि परिवार वाद के सहारे सियासत में ठौर ढूंढ रहे नेताओं को शायद जमीनी मध्यवर्गीय सपनों का इल्म नहीं और न ही देश को आगे बढ़ा ले जाने की मंशा ही है. वो आपदा में सत्ता के मुंगेरी सपने बुनने में ही लगे हैं. आपको बेशक यह पता ही होगा कि जब देश भर में परीक्षा के विरोध का ताना-बाना बुना जा रहा था तो देश-दुनिया के 150 से ज्यादा प्रोफेसर्स प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को जल्द परीक्षा करवाने की मांग का पत्र लिख रहे थे. पत्र में लिखा गया कि मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा यानी जेईई मेंस और नीट में यदि और देरी हुई तो छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा. पत्र में हस्ताक्षर करने वालों में डीयू, इग्नू, लखनऊ यूनिवर्सिटी, जेएनयू, बीएचयू, आईआईटी दिल्ली और लंदन यूनिवर्सिटी, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ यरुशलम और इजराइल के बेन गुरियन यूनिवर्सिटी के भारतीय प्रोफेसर्स शामिल हैं.
ऐसा नहीं कि कोविड की विभीषिका से एनटीए, जो जेईई मेन और नीट परीक्षा कराने जा रही है, अनभिज्ञ है. राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने सितंबर की परीक्षा के लिए खास तैयारी की है. परीक्षा केंद्रों की संख्या बढ़ाने, एक सीट छोड़कर बैठाने, प्रत्येक कमरे में कम उम्मीदवारों को बैठाने और प्रवेश-निकास की अलग व्यवस्था जैसे खास कदम उठाकर छात्रों को परीक्षा का बेहतर माहौल दिया जायेगा. एनटीए ने अपने एक बयान में साफ-साफ कहा है कि जेईई के लिए परीक्षा केंद्रों की संख्या 570 से बढ़ाकर 660 की गई हैं जबकि नीट परीक्षा अब 2,546 केंद्रों की बजाय 3,843 केंद्रों पर होगी. यहां बता दें कि जेईई कंप्यूटर आधारित परीक्षा है जबकि नीट पारंपरिक तरीके से कलम और कागज पर होती है. इसके अलावा जेईई-मुख्य परीक्षा के लिए पालियों की संख्या आठ से बढ़ाकर 12 कर दी गई है और प्रत्येक पाली में छात्रों की संख्या अब 1.32 लाख से घटाकर 85,000 हो गई है.
बेशक, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के लिए जेईई और नीट परीक्षा कराना बहुत आसान नहीं है. तकरीबन 25 लाख छात्रों की इन परीक्षाओं को करा ले जाने का हौसला भी अपने आप में बेशक बड़ा फैसला है. लेकिन मजबूत सरकारों के लिए ऐसे ही मुश्किल भरे फैसले लिटमस टेस्ट रहे हैं.

सौजन्य से पाञ्चजन्य

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